सापेक्ष अनुक्रमणिका में निम्नलिखित विषयों के वर्गीक निकालिये
आरंभ में संयुक्त विषयों को वर्गीकृत करने के लिए, किसी प्रयोक्ता को अनेक वर्गीकों के अंतर्गत देखने की आवश्यकता पड़ सकती है। किन्तु धीरे-धीरे अभ्यास के साथ, प्रथम अनुमान भी उपयोगी लगते हैं।संयुक्त विषयों के वर्गीकरण में निम्नलिखित नियम अपनाया जा सकता है: यदि किसी संयुक्त विषय में दो धारणाएँ हैं जिनमें से एक कोई पदार्थ या वस्तु है तथा दूसरी कोई तकनीक, क्रिया या प्रक्रिया है। तो पदार्थ या वस्तु के अंतर्गत देखना उचित होगा। क्योंकि सामान्यत: दशमलव की अनुसूचियों में किसी विद्याशाखा से संबंधित सामान्य पक्ष जैसे क्रिया, प्रक्रिया या तकनीक पहले एक साथ दिए जाते हैं। उसके पश्चात वह पदार्थ या वस्तुएं दी जाती हैं जिनके साथ यह सामान्य पक्ष एकल या सामूहिक योजक निर्देशों की मदद से जोड़े जा सकते हैं। अत: शीर्षक 'गेहूं की बीमारियां' को वर्गीकृत करने के लिए गेहूं शब्द के अंतर्गत देखना उचित होगा जिसमें 'बीमारियां' पक्ष को जोड़ने के लिए निर्देश मिल जाते हैं।
। यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि यदि कोई विशिष्ट तकनीक या प्रक्रिया हो तो उसके नाम से देखना ज्यादा उपयोगी होगा। उदाहरण - लौह धातुकर्म की सीमन्स प्रक्रिया (Siemens process of metallurgy of ferrous metals) की प्रविष्टि सीमन्स प्रक्रिया (Siemens process) के अंतर्गत मिल जाएगी।
9. अनुक्रमणिका के साथ अनुसूची का प्रयोग
अनुक्रमणिका के प्रयोग में सदैव इस तथ्य को ध्यान रखना आवश्यक है कि कभी भी कोई संख्या केवल अनुक्रमणिका मात्र से देखकर प्रयोग नहीं की जानी चाहिए। सदैव उस संख्या को संबंधित अनुसूची अथवा सारणी में देखने के पश्चात ही प्रयोग में लाना चाहिए।इसका मुख्य कारण यह है कि अनुसूची में संबंधित वर्गीक पदानुक्रम में दिया होने के कारण उसके संदर्भ का पता चल जाता है, जो कि अनुक्रमणिका में कमी-कभी स्पष्ट नहीं हो पाता। साथ ही, अनुसूची में किसी वर्गीक के साथ दिए गए विभिन्न निर्देश अंतिम वर्गीक निर्धारण में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।
अंत में यह कहा जा सकता है कि दशमलव पद्धति में वर्गीक निर्माण के लिए सापेक्ष महत्वपूर्ण साधन है। यह विशेषकर जटिल तथा अस्पष्ट धारणाओं के वर्गीकरण में प्रमुख भूमिका निभाता है।
10. सारांश
| इस प्रकार यह स्पष्ट है कि अनुक्रमणिका शेष दो खण्डों की कुंजी है, जिसकी सहायता से सारणियों तथा अनुसूची तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। इस अध्याय में अनुक्रमणिका के स्वरूप, इसमें प्रयुक्त विभिन्न अनुदेश, निर्देश आदि को उदाहरण सहित स्पष्ट किया गया है। अनुक्रमणिका का ठीक तरह से उपयोग हमें उचित वर्गीक बनाने में विशेष सहायता प्रदान करेंगे जो कि आगे आने वाले अध्यायों के अध्ययन पर स्पष्ट होगा।
11. अभ्यासार्थ प्रश्न
:Agriculture libraies (कृषि पुस्तकालय) 2. Analytical biochemistry of plants (पौधों का विश्लेषणात्मक जैव रासायनिक अध्ययन) 3. Awadhi language (अवधी भाषा) 4. Technology of manufacturing blankets (कम्बल निर्माण प्रौद्योगिकी) 5. Management of change (परिवर्तन प्रबंधन)। 6. Collection of stories (कहानियों का संग्रह) 7. Technology of air-to-air guided missiles (हवा से हवा में मार करने वाली निर्देशित मिसाइल प्रौद्योगिकी) n8. Keynesian school of economics (अर्थशास्त्र में कीन्स के सिद्धान्त) 9. Curriculum in Political science (राजनीति विज्ञान का पाठ्यक्रम)10. Numismetics of gold coins (स्वर्ण मुद्राशास्त्र) वर्गीक 1. 026.63
2. 808.83 3. 581.192 85 4. 623.451 91 5. 491.49
6. 330.156 7. 677.626
8. 375.32 9. 958.4.06
10. 737.43 12. विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रंथसूची 1. DEWEY (Melvil), Dewey Decimal Classification and Relative Index, Ed
19, 1979, V1. 2. SATIJA (MP), Exercise in the 19th edition of Dewey Decimal
Classification, 2001, Concept, New Delhi.
इकाई-11 : सारणी-1 : मानक उपविभाजनों का प्रयोग उद्देश्य
1. मानक उपविभाजनों की विशेषताओं से अवगत कराना, 2. सारणी 1. मानक उपविभाजनों के उपयोग की जानकारी देना,3. सारणी 1 में प्राथमिक सारणी के प्रयोग की जानकारी देना। संरचना/विषय वस्तु
1. विषय प्रवेश 2. मानक उपविभाजनों की विशेषताएं 3. सारणी 1 का उपयोग 4. मानक उपविभाजनों के साथ एक से अधिक शून्यों का प्रयोग
मानक उपविभाजनों को एक साथ जोड़कर बनाए गए खण्ड दो की अनुसूचि में लिखित
अंकन 6. सारणी 1 में प्राथमिक सारणी का प्रयोग 7. मानक उपविभाजनों का विस्तार 8. वर्गीकृत शीर्षक 9. सारांश 10. अभ्यासार्थ प्रश्न
11. विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रन्थ सूची 1. विषय प्रवेश
पुस्तकालय वर्गीकरण के अग्रगामी वर्गाचार्य Melvil Dewey ने इयूई दशमलव वर्गीकरण (डी डी सी) के प्रथम संस्करण से ही उपविभाजनों का प्रयोग आरंभ कर दिया था। दशमलव पद्धति के प्रथम संस्करण में मानक उपविभाजनों की कोई अलग सारणी का प्रावधान नहीं था लेकिन विभिन्न मुख्य विभाजनों के प्रलेखों के स्वरूप में भिन्नता दिखाने के लिए कुछ तैयार वर्गीक दिए गए थे। दशमलव के दूसरे संस्करण (1885) में रूप विभाजनों (Form Division) की सारणी का प्रावधान किया गया। 17 वें संस्करण (1965) में रूप विभाजनों की सारणी का नाम मानक उपविभाजन (Standard Subdivision) कर दिया गया। 19वें संस्करण (1979) में मानक उपविभाजनों की सारणी 1 में प्राथमिकता क्रम सारणी को सम्मिलित किया गया। इसका उद्देश्य यह निश्चित करना है कि दो या इससे अधिक मानक उपविभाजनों में से वर्गाकार को किसे प्राथमिकता देनी चाहिए। 19वें संस्करण के खण्ड एक पृष्ठ 1 पर प्राथमिकता क्रम सारणी का विवरण दिया गया है और खण्ड एक पृष्ठ 2-13 पर सभी मानक उपविभाजन दिए गए है। खण्ड Editor's Introduction के Section 5.24, 8.53 और 8.7 में मानक उपविभाजन को जोड़ने के नियम दिए गए हैं।
2. मानक उपविभाजनों की विशेषताएं
मानक उपविभाजन का प्रयोग अकेले नहीं किया जा सकता। इसका उपयोग खण्ड दो की अनुसूचियों में उल्लिखित वर्ग संख्याओं के साथ किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि मानक उपविभाजन का उपयोग कभी भी आधार संख्याओं (Base Number) के रूप में नहीं किया जा सकता । सारणी एक से सम्बद्ध मानक उपविभाजन अंकन का आरंभ शून्य से होता है। जैसे कि - 012 वर्गीकरण - 0683 कर्मचारी वर्ग का प्रबंधन। 3. सारणी 1 का उपयोगकिसी ग्रन्थ का वर्गीकरण किए जाने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि क्या इसके विषयवस्तु के साथ किसी मानक उपविभाजन का उपयोग होगा? ग्रंथ के विषय की आधार संख्या खण्ड दो की अनुसूची से निर्धारित किए जाने के पश्चात खण्ड एक की सारणी एक में से विभिन्न मानक उपविभाजनों से संबंधित उपविभाजन अंकन को आधार संख्या के साथ जोड़ा जाता है। सारणी 1 का उपयोग खण्ड दो की अनुसूचियों की संख्याओं के साथ बिना किसी निर्देश के भी किया जा सकता है। जैसे कि - शीर्षक - असाहित्यिक समाज का अध्ययन
Study of Non-literate Societies 301.720 7
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