प्रत्यक्ष विधि से वर्गीकरण की प्रक्रिया में सर्वप्रथम तीनों सारांशों का प्रयोग
इस प्रकार, दूरसंचार के लिए प्रयुक्त एक वर्गीक 384 होगा। 2.23 बिन्दु एवं रिक्त स्थान | डी डी सी पद्धति में प्रयुक्त समस्त संख्यांक दशमलव अंश की तरह माने जाते हैं। किन्तु अंकन की सरलता के दृष्टिकोण से होने वाला दशमलव बिन्दु वर्गीक के प्रथम अंक के पूर्व नहीं लगाया जाता है। इस पद्धति में कोई भी वर्गीक कम से कम तीन अंकों का होता है। मुख्य वर्ग तथा उनके प्रभागों के संदर्भ में (जिनमें क्रमशः एक तथा दो प्रभावी अंक प्रयुक्त होते हैं) इन अंकों के बाद शून्य जोड़कर न्यूनतम तीन अंकों की आवश्यकता को पूरा किया जाता है। अत: मुख्य वर्ग 'सामाजिक विज्ञान' का वर्गीक 300 होगा न कि 3, इसी प्रकार 'अर्थशास्त्र' का वर्गीक भी 330 ही हो जाता है। तीसरे तथा चौथे अंकों के मध्य एक बिन्दु (.) लगा दिया जाता है। यह बिन्दु दशमलव बिन्दु नहीं है अपितु एक विराम है जिसका प्रयोग मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से अधिक संख्याओं की एकरसता को तोड़ने के लिए किया जाता है। इसका अन्य कोई उपयोग अथवा उद्देश्य नहीं है।यदि कोई वर्गीक छ: से अधिक अंकों का हो तो छठे तथा सातवें अंक के मध्य एक अंक का रिक्त स्थान छोड़ दिया जाता है। इसी प्रकार, आवश्यकतानुसार नवें तथा दसवें अंकों के मध्य और फिर बारहवें तथा तेरहवें अंकों के मध्य भी एक अंक का स्थान छोड़ा जाएगा। अत: बिन्दु के पश्चात आने वाले प्रत्येक अंक के बाद एक अंक का प्रस्तुतीकरण 530.133 2 होगा न कि 530.133 2 । इसी प्रकार, 'गणितीय अर्थशास्त्र' के वर्गीक का प्रस्तुतीकरण 330.154 3 होगा।
यह बिन्दु तथा रिक्त स्थान आंखों को आराम पहुंचाने और प्रसूची से ग्रंथ संग्रह कक्ष में ग्रंथ तक पहुंचने की अल्प समयावधि में वर्गीक को याद रखने में मदद करते हैं।
3. तृतीय खण्ड : सापेक्ष अनुक्रमणिका (Relative Index)
इस 1217 पृष्ठों के तृतीय खण्ड में सम्पूर्ण रूप से सापेक्ष अनुक्रमणिका समाहित है। अनुक्रमणिका के मूल पाठ से पूर्व संक्षिप्त निर्देश (पृ. ४) तथा इस खण्ड में प्रयुक्त शब्दों के 171संक्षिप्त रूपों की कुंजी (पृ. xi = xiii) दी गई हैं। सापेक्ष अनुक्रमणिका मेलविल इयूई का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। यह वर्गकारों के लिए अत्यन्त उपयोगी है तथा अनेक व्यक्ति अनुक्रमणिका की सहायता से अनुसूचियों के प्रयोग को प्राथमिकता देते हैं।
अनुक्रमणिका में किसी भी विषय के सभी पक्षों को (जो अनुसूचियों के विद्याशाखानुसार व्यवस्थित होने के कारण अलग-अलग मुख्य वर्गों, प्रभागों या अनुभागों में बिखर जाते हैं) एक साथ एक स्थान पर दिखाया जाता है। इसीलिए इसको सापेक्ष अनुक्रमणिका कहा जाता है। अत: अनुसूची तथा अनुक्रमणिका एक दूसरे के पूरक हैं। 4. वर्गीक निर्माण विधि प्रायोगिक वर्गीकरण की सम्पूर्ण प्रक्रिया दो अवस्थाओं में पूर्ण होती है : (अ) प्रलेख के विशिष्ट विषय निर्धारण का बौद्धिक कार्य, (ब) किसी वर्गीकरण पद्धति में निहित प्रावधानों के अनुसार उस विशिष्ट विषय के लिए उपयुक्त वर्गीक निर्धारण का शिल्प कौशल।
4.1 विशिष्ट विषय निर्धारण
| किसी प्रलेख के विशिष्ट विषय का निर्धारण वर्गीकरण की सम्पूर्ण प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण है। यह किसी भी वर्गीकरण पद्धति के विशिष्ट प्रावधानों से स्वतंत्र एक बौद्धिक कार्य है। इसके लिए वर्गकार का सम्पूर्ण ज्ञान से सामान्य परिचय होना आवश्यक है। आज के विशिष्टीकरण के युग में ऐसा हो पाना नितान्त असंभव है। फिर भी सामान्य वर्गीकरण पद्धतियों में ज्ञान के विभिन्न वर्गों तथा उनके उपविभाजनों से परिचित हो जाने के पश्चात अभ्यास हेतु प्रारंभिक जानकारी मिल जाती है। 4.11 विषय विश्लेषणकिसी भी प्रलेख के विशिष्ट विषय का निर्धारण करने के लिए उसके शीर्षक, उपशीर्षक, प्रस्तावना, विषय-सूची, मूल पाठ तथा अन्य संबंधित स्रोतों का अध्ययन किया जा सकता है।
एक पुस्तकालय के वर्गकार को विषय विश्लेषण करते समय न केवल प्रलेख में वर्णित विशिष्ट विषय का स्थान निर्धारित करना होता है बल्कि वर्गीकरण की प्रयुक्त पद्धति के प्रावधानों का भी स्मरण रखना होता है। अत: विशिष्ट विषय निर्धारण के पश्चात, वर्गकार का मुख्य कार्य पद्धति के अनुसार मूल विषय, तथा तीन विभिन्न पक्षों का निर्धारण करना है। प्रथम, मूलविषय के निरूपण का दृष्टिकोण जैसे दर्शन, सिद्धान्त, इतिहास, शोध या फिर प्रयोगात्मक दृष्टिकोण। 'पुस्तकालय वर्गीकरण के सिद्धान्त', दवितीय वह प्रलेख जिसमंश मूल विषय को किसी दृष्टिकोण से निरूपित किया गया है, स्वयं एक शब्दकोश, पत्रिका या विश्वकोश कुछ भी हो सकता है। तथा तृतीय उपरोक्त आन्तरिक तथा बाह्य दोनों विशेषताओं के अतिरिक्त वह प्रलेख किसी भी भौतिक माध्यम में हो सकता है, जैसे पुस्तक, माइक्रोफिश, वीडियो कैसेट, दशमलव फिल्म, फोनोरिकार्ड सी डी रोम या एक मल्टीमीडिया इकाई।
4.2 वर्गीक निर्माण
अत: एक वर्गकार को प्रलेख के तीन भिन्न पक्षों को पहचानना होता है। यह कार्य पूर्ण हाने पर विषय तथा उसके निरूपण के पक्षों को दशमलव पद्धति के प्रावधानों के अनुसार वर्गीकृत कर लिया जाता है। इसके लिए सर्वप्रथम हम मूल विषय को वर्गीकृत करते हैं।तत्पश्चात उसके दृष्टिकोण तथा भौतिक माध्यम को तथा अंत में पद्धति के प्रावधानों के अनुसार संश्लेषित वर्गीक का निर्माण कर लिया जाता है।
डी डी सी पद्धति में वर्गीक का निर्माण दो प्रकार से किया जा सकता है: (अ) प्रत्यक्ष या अनुसूचियों के द्वारा।
(ब) परोक्ष या अनुक्रमणिका के द्वारा। सापेक्ष अनुक्रमणिका के प्रयोग की विधि संबंधित अध्याय में विस्तारपूर्वक दी गई है।
प्रत्यक्ष विधि ही डी डी सी के सम्पादक मण्डल द्वारा संस्तुत विधि भी है क्योंकि इससे पद्धति की आन्तरिक संरचना तथा प्रावधानों को शीघ्र समझने में सहायता मिलती है।
4.21 सारांशों का प्रयोग
तीनों सारांशों का वर्णन इसी अध्याय में प्रथम खण्ड के अंतर्गत पहले ही किया जा चुका है। यहां पर उनके प्रयोग की विधि से अवगत कराया जा रहा है।
किसी प्रलेख के विशिष्ट विषय का निर्धारण करने के पश्चात वर्गीक निर्माण हेतु प्रथम चरण में सारांश का प्रयोग किया जाता है। किसी एक मुख्य वर्ग का निर्धारण करता है। 'चुनाव प्रणालियां' विषय के वर्गीकरण के लिए आसानी से मुख्य वर्ग 300 Social sciences निर्धारित किया जा सकता है।
अब, नौ मुख्य वर्गों को छोड़कर, दूसरे चरण में वितीय सारणी में से, जिसमें प्रत्येक मुख्य वर्ग को दस प्रभागों में विभक्त किया गया है, केवल मुख्य वर्ग 300 के प्रभागों पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। इस चरण में दस प्रभागों में से एक प्रभाग का निर्धारण किया जाता है। निश्चित रूप से 'चुनाव प्रणालियां राजनीति विज्ञान के अंतर्गत एक उपविभाजन है। अत: इस चरण में
320 Political science प्रभाग निर्धारित किया जा सकता है।
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