Kanishka and his achievements Skip to main content

Kanishka and his achievements

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कनिष्क–भारत के कुषाणवंशी शासकों में कनिष्क को सबसे अधिक शक्तिशाली और महत्त्वपूर्ण माना जाता है। कनिष्क विम कदफिस की मृत्यु के पश्चात् सबसे अधिक प्रसिद्धि पाने वाला शासक था। इसी वंश में आगे चलकर हुविष्क और वासुदेव के मध्य भी कनिष्क नामक एक राजा हुआ था। अतः उससे अलग प्रमाणित करने के लिए इसे कनिष्क प्रथम भी कहा जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार मार्शल का मत है कि 'विम कदफिस के पश्चात् कुषाण साम्राज्य में कुछ अव्यवस्था उत्पन्न हो गयी । इस काल में एक या , गर्वनरों ने सोटर मेगस के नाम से भारत में राज्य किया। विम कदफिस के लगभग 50 बाद कनिष्क प्रथम का उदय हुआ।

विम कदफिस और कनिष्क प्रथम का पारस्परिक सम्ल क्या था? इस सम्बन्ध में कोई निश्चित तथ्य उपलब्ध नहीं है। दुर्भाग्य से हमें उसका अधिक वृतान्त ज्ञात नहीं है लेकिन इसमें कोई सन्देह नहीं है कि कुषाण सम्राटों में वह महान था। कनिष्क प्रथम के कारण ही कुषाण वंश का भारत के सांस्कृतिक एवं राजनीतिक इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि अभी तक सन्देहास्पद है। प्रथम शताब्दी ई.पू. से तृतीय शताब्दी तक उसकी अनेक तिथियाँ बताई गई हैं, कैनेडी और फ्लीट कनिष्क को ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी में रखते हैं। एलन के अनुसार कनिष्क को ईस्वी सन् की प्रथम शताब्दी में होना चाहिए ।

मार्शल स्टेन कोनो और स्मिथ ने कनिष्क को125 ई. में रखा है। डॉ. मजूमदार और भण्डारकर कनिष्क की तिथि क्रमशः 248 ई. एवं 278 ई. में मानते हैं। थामस बनर्जी एवं रेप्सन 78 ई. को कनिष्क की तिथि बताते हैं। आज प्रायः समस्त इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि कनिष्क या तो प्रथम शताब्दी के अन्तिम चरण अथवा द्वितीय शताब्दी के प्रथम चरण में हुआ था। इस तरह 78 ई. से 105 ई. तक इसे कहीं भी रखा जा सकता है किन्तु अधिकांश इतिहासकार यह मानते हैं कि 78 ई. में ही उसका राज्यारोहण हुआ जो तथाकथित शक सम्वत् के प्रारम्भ होने की तिथि मानी जाती है। विख्यात इतिहासकार रामशरण शर्मा के अनुसार “कनिष्क को भारतीय इतिहास में दो कारणों से महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। प्रथम उसने 78 ई. में नया सम्वत् प्रारम्भ किया जो अब तक शक सम्वत् के नाम से जाना जाता है और आज भी भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। दूसरे कनिष्क ने बौद्ध धर्म को दिल खोल कर संरक्षण दिया।”

| कनिष्क प्रथम की उपलब्धियाँ (या उसके कार्यों का मूल्यांकन) इसमें कोई सन्देह नहीं कि कनिष्क शान्ति और युद्ध के कार्यों में समान रूप से महान् था। हम सबसे पहले उसकी युद्ध के क्षेत्र में उपलब्धियों का और तत्पश्चात् शान्ति के क्षेत्र में इसकी उपलब्धियों का विवेचन करेंगे।

(क) युद्ध के क्षेत्र में उपलब्धियाँ
(1) विजेता के रूप में कनिष्क एक महान् विजेता था । चूँकि विम कदफिस ने पूर्वोत्तर एशिया में अपना साम्राज्य बढ़ाने के लिए चीन के ऊपर आक्रमण किया परन्तु उसको हार खानी पड़ी और विवश होकर कर देना पड़ा। इसलिए कनिष्क ने अपने शासन प्रबंध के प्रारम्भ में इस गलती को नहीं दुहराया। उसने एक कुशल एवं सफल विजेता के रूप में अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करने के लिए उत्तर भारत की ओर ध्यान दिया । जहाँ उस समय राजनीतिक जीवन शिथिल पड़ गया था। उसने उसी क्षेत्र में अपना राज्य विस्तार किया। कनिष्क के हृदय में वीर भावना एवं उत्साह का प्राबल्य था । सिंहासन ग्रहण करने के समय वह केवल बैक्ट्रिया, अफगानिस्तान, बिलोचिस्तान, पंजाब तथा सिंध का स्वामी था। कुछ ही समय में उसने अपने भुजबल से एक विस्तृत साम्राज्य की स्थापना की उसकी विजयों का संक्षिप्त उल्लेख निम्न प्रकार है।

(1) मगध की विजय (The conquest of Magadha)- बौद्ध ग्रन्थों के आधार पर यह कहा जाता है कि उसने पंजाब को पारकर मध्य देश होते हुए पाटलिपुत्र पर आक्रमण किया। वहाँ के राजा लिच्छिवी अथवा कोटकुल को पराजित कर उससे युद्ध क्षतिपूर्ति के रूप में एक बड़ी धनराशि माँगी । परन्तु उसके बदले में बौद्ध विद्वान अश्वघोष और भगवान बुद्ध का भिक्षा कमंडलु प्राप्त कर प्रसन्न हुआ और अपनी राजधानी पुष्पपुर (पेशावर) वापस चला गया। तदन्तर महान् दार्शनिक अश्वघोष कनिष्क दरबार को ही सुशोभित करता था। यह भी कहा जाता है कि कनिष्क ने इससे ही बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इसलिए कनिष्क की पाटलिपुत्र या मगध विजय के सम्बन्ध में कोई सन्देह नहीं रह जाता । स्पूनर महोदय ने अपनी खुदाई में कनिष्क काल की बहुत-सी मुद्राएं गाजीपुर और गोरखपुर में प्राप्त की हैं। इनसे इस तथ्य की पुष्टि होती है कि कनिष्क ने सुदूर बंगाल तक के प्रदेश को विजय किया होगा। सारनाथ तथा काशी उसके साम्राज्य के इस भाग के केन्द्र स्थल थे।

| (2) कश्मीर की विजय (The conquest of Kashmir)-कनिष्क ने सबसे पूर्व कश्मीर पर आक्रमण किया। कश्मीर की सुन्दर घाटी कनिष्क को बहुत प्रिय थी। अपने पिता के शासनकाल में वह कई बार कश्मीर में रह चुका था और बहुत दिनों से उसकी यह प्रबल इच्छा थी कि वह कश्मीर को अपने अधीन करे और उसे कश्मीर जीतने में किसी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा। यद्यपि कश्मीर विजय का विस्तारपूर्वक वृत्तान्त नहीं मिलता। कल्हड़ की राजतरंगिणी के अनुसार कनिष्क ने कश्मीर को जीतकर उस पर राज्य किया। यद्यपि कश्मीर के किस सम्राट के साथ कनिष्क ने युद्ध किया इसका विवरण नहीं मिलता। कनिष्क ने कश्मीर में अपने नाम पर कनिष्कपुर नामक नगर बसाया जो सम्भवतः आधुनिक बारामूला के समीप वर्तमान कनीस्पोर ग्राम है।

राजतरंगिणी के अनुसार “उसके पश्चात् यहाँ पर हुष्क, जुष्क और कनिष्क तीन राजाओं ने राज्य किया और अपने- अपने नाम पर तीनों ने नगरों की स्थापना की । राजा जुष्क ने जो बिहार सहित जुष्कपुर का संस्थापक था जयस्वामीपुर की भी स्थापना की । धार्मिक कार्यों में संलग्न तुरुष्क जाति के इन राजाओं ने शुष्कलेच तथा अन्य स्थानों पर मठ, चैत्य तथा उसी प्रकार के अन्य भवन बनवाए।” कनिष्क ने कश्मीर में ही चौथी बौद्ध महासभा का आयोजन किया था यहाँ इसने अनेकों बिहारों का भी निर्माण करवाया।

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