फाह्यान द्वारा वर्णित भारत की सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
Describe briefly the Social and religious condition of India as narrated by Fa-hian.(12) लोगों की दान प्रवृत्ति- “राजा और जनता दोनों मंदिर बनवाते हैं और भूदान करते हैं। देश में परोपकारी संस्थाएँ अनेक हैं। लोग सड़कों के किनारे और अन्यत्र दानशालाएँ बनवाते हैं जहाँ मंत्रियों और भिक्षुओं के खाने-पीने और सोने का प्रबन्ध रहता है।” जब भिक्षु वार्षिकी अग्रहार पा जाते हैं तब सेठ ब्राह्मण लोग वस्त्र तथा उपहार बाँटते हैं। भिक्षु उन्हें लेकर यथा भाग भुक्त करते हैं। बुद्ध के बोधि प्राप्त करने से ही यह रीति आचार व्यवहार और नियम अविच्छिन्न रूप में निरन्तर चले आ रहे हैं। देश में धनी व्यक्तियों में औषधालय बनवाये थे । यहाँ निर्धन निराश्रित विधवायें एवं अंगहीन व्यक्ति नि:शुल्क चिकित्सा प्राप्त करते थे। वहाँ उन्हें भोजन भी दिया जाता था।”
| (13) कान्यकुब्ज नगर-
“कान्यकुब्ज नगर गंगा के किनारे स्थित था। यहाँ दो बौद्ध मठ थे दोनों ही हीनयान सम्प्रदाय के थे। नगर के पश्चिम की ओर 6 अथवा 7 मील चलन के उपरान्त गंगा के किनारे वह स्थान था जहाँ महात्मा बुद्ध ने शिष्यों को उपदेश दिया था।(14) सरकार की आय- सरकार की आय का मुख्य साधन भूमि कर था।
(15) कौशल जनपद के नगर श्रावस्ती का वर्णन- फाह्यान कान्यकुब्ज से दक्षिण दिशा और कौशल जनपद के नगर श्रावस्ती में जा पहुंचा था। इस नगर में बहुत कम लोग रहते अब मिलाकर 200 के लगभग परिवार निवास करते थे। इस नगर का शासक (महात्मा 3 काल में) प्रसेनजित था। श्रावस्ती के जेतवन विहार में बौद्ध भिक्षुओं ने फाह्यान का जत किया था और उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि पृथ्वी की दूराति दूर सीमाओं से भी मनुष्य भारत आ रहे थे।
(16) कपिलवस्तु- श्रावस्ती के बाद चीनी यात्री कपिलवस्तु (बुद्ध की जन्मभूमि) चा। वह इसके बारे में लिखता है “कपिलवस्तु नगर में न राजा है न प्रजा । केवल खण्डहर उजाड़ हैं। कुछ श्रमण रहते हैं और दस घर अधिवासी हैं। कपिलवस्तु जनपद जन न्य है। अधिवासी बहुत कम हैं। मार्ग में श्वेत हस्ती और सिंह से बचने की आवश्यकता है। बिना सावधानी के जाने योग्य नहीं है।”
| (17) राजगृह नगर-
राजगृह नगर के भीतर सुनसान है कोई मनुष्य नहीं।”| (18) वैशाली- वैशाली में आम्रपाली द्वारा निर्मित अनेक बौद्ध विहारों के अवशेषों को फाह्यान ने देखा था। इस नगर में राधा स्वामी नामक ब्राह्मण रहता था जो कि महायान शाखा से सम्बन्धित था। इस नगरी का राजा भी उसे अपना गुरु मानता था । फाह्यान इस नगर में तीन वर्षों तक रहा। बौद्ध धर्म के जिन ग्रंथों का अध्ययन वह करना चाहता था वे सभी उसे यहीं प्राप्त हुए। वह वैशाली के बारे में लिखता है “मध्यदेश में यह नगर सबसे बड़ा है। इसके निवासी सम्पन्न, समृद्धिशाली और दान तथा न्याय में स्पर्धालु हैं। प्रतिवर्ष दूसरे माह की आठवीं तिथि को मूर्तियों की यात्रा निकलती है। इस अवसर पर वहाँ चार पहियों की गाड़ी बनाते हैं और उस पर पाँच मंजली मीनार बनाते हैं जो बाँस आदि से बनायी जाती है। यह 22 फीट से अधिक ऊंचा होता है। देवताओं की मूर्तियाँ सोने चांदी और स्फटिक की बनती है। ध्वज और चाँदनी लगती हैं। बीच में बुद्ध देव की प्रतिमा होती है। और उसके पास ही बोधिसत्व की मूर्तियाँ। गाने बजाने वाले साथ चलते हैं। फूल और सुगन्धित पदार्थों से पूजा होती है।” |
(19) पाटलिपुत्र-
फाह्यान ने पाटलिपुत्र को भी देखा था। जब यहाँ उसने अशोक के राजमहल को देखा तो वह आश्चर्य चकित हो गया। इसकी भव्यता से वह इतना प्रभावित हुआ कि उसको विश्वास हो गया कि इसे देवों ने बनवाया था। उस समय पाटलिपुत्र में अशोक द्वारा निर्मित स्तूप भी था। इसके पास दो विहार थे- एक हीनयान और दूसरा महायान का। इन दोनों विहारों में बौद्ध भिक्षुओं की संख्या लगभग 600-700 थी । ये भिक्षु अपनी विद्वत्ता के लिए बड़े ही विख्यात थे। इनके प्रवचन सुनने के लिए विद्यार्थी दूर-दूर से आते ५। पाटलिपुत्र में एक उत्तम चिकित्सालय था जहाँ निर्धन रोगियों के लिए मुफ्त भोजन और चिकित्सा का प्रबन्ध था।| फाह्यान के अनुसार ‘पाटलिपुत्र नगर के लोग बड़े समृद्ध और परोपकारी थे तथा मक कार्यों में एक दूसरे से होड़ करते थे। वैश्य परिवार काफी आगे बढ़े हुये थे और 'वश्य परिवारों के मुखिया दानशालाओं का निर्माण करवाते थे। इस नगर के निवासी प्रतिवर्ष दूसरे मास की अष्टमी को बुद्ध और बोधिसत्व की अलंकृत 4 4 जन थे । ये मूर्तियां एक शैली की बनी हुई परन्तु - 7 // ॥ १४ ॥ १॥ बीस रथों पर ले जायी जाती थी।
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