गुप्त साम्राज्य के पतन के कारणों का विश्लेषण कीजिए।
गप्तकाल के शासकों का शासन काल लगभग 275 ई. से 550तक रहा। इस कालावधि में समुदगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय तथा स्कन्दगुप्त जैसे पराक्रमी सम्राटों ने अपने विशाल साम्राज्य को अक्षुण्ण बनाये रखा और आन्तरिक विद्रोहों और बाह्य आक्रमणों से राज्य और शासन को क्षति नहीं पहुंचने दी । किन्तु स्कन्दगुप्त के बाद गुप्त साम्राज्य के पतन और पराभव की प्रक्रिया आरम्भ हो गई और सुदूरस्थ प्रान्तपति और सामन्त अपना अपना स्वतन्त्र शासन स्थापित करने लगे । यद्यपि बुद्ध गुप्त ने इस पतन की प्रक्रिया को रोकने का प्रयास किया परन्तु वह भी असफल रहा। विसंगठन एवं ह्रस की विविध प्रवृत्तियाँ क्रियाशील होने लगी तथा विषम परिस्थितियों एवं जटिल समस्याओं के फलस्वरूप गुप्तकाल का विनाश हुआ। यह अध: पतन आकस्मिक नहीं था। अतः इस क्रमिक विनाश के कुछ कारण तो आन्तरिक थे । और कुछ बाह्य । इस सम्बंध में डॉ. उपेन्द्र ठाकुर लिखते हैं कि “यह सही है। कि स्कन्दगुप्त के शौर्य एवं पराक्रम के कारण विध्वंसकारी शक्तियाँ कुछ समय के लिए शान्त कर दी गई किन्तु उसकी मृत्यु के पश्चात् एक बार फिर नये सिरे से वे सामने आयीं। इतना तो स्पष्ट है कि इस समय तक आते- आते गुप्त सम्राटों की प्रचन्ड आक्रामक नीति मन्द पड़ गई थी और वे अब सुरक्षात्मक नीति का अनुसरण कर रहे थे। इसके बावजूद नई शक्तियाँ जोर पकड़ती ही जा रही थी और बुद्धगुप्त के समय तक आते- आते साम्राज्य का मूलभूत स्वरूप भी बदलने लग गया था।
कुछ विद्वानों का मानना है कि नरसिंह गुप्त के राज्यारोहण के समय या सिंहासन रूढ़ होने के कुछ ही दिनों के पश्चात् आन्तरिक विद्रोह, विदेशी आक्रमण एवं प्रान्तीय तथा सामन्तों के सफल विद्रोहों ने गुप्त साम्राज्य की पतन की प्रकिया को लगभग पूरा कर दिया। इस तरह गुप्त साम्राज्य के पतन के निम्न कारण रहे -
(1) स्कन्दगुप्त के निर्बल उत्तराधिकारी -
समुद्रगुप्त के विशाल साम्राज्य को चन्द्रगुप्त द्वितीय ने ज्यों का त्यों बनाये रखा। स्कन्दगुप्त तक तो यह क्रम चलता रहा परन्तु स्कन्दगुप्त के जो उत्तराधिकारी हुए वे इतने निर्बल सिद्ध हुए कि गुप्त साम्राज्य को सुरक्षित न रख सके । उसके बाद केवल बुद्धगुप्त और भानुगुप्त ही शक्तिशाली सिद्ध हुए और उन्होंने शत्रुओं से देश की रक्षा भी की परन्तु, शेष गुप्त शासक सर्वथा निर्बल सिद्ध हुए और कुछ का शासन ही अल्पकालीन रहा। अतः गुप्त शासन का प्रभाव दिनों दिन शिथिल होता चला गया।डॉ. उपेन्द्र ठाकुर का कथन है कि “स्कन्दगुप्त ने फिर भी साम्राज्य की प्रतिष्ठा बनाये रखी । परन्तु उसकी मृत्यु के पश्चात् अयोग्य उत्तराधिकारियों का एक तांता सा बंध गया। जिसमें बुद्धगुप्त और भानुगुप्त के अतिरिक्त और कोई भी शासक ऐसा नहीं हुआ जो साम्राज्य की सार्वभौमिकता तथा उसके गौरव को सुरक्षित रख सकता। प्रकट है कि दीवार कमजोर हो जाने पर मामूली धक्के से भी वह गिर जाती है और यही बात इस साम्राज्य के साथ हुई। |
(2) केन्द्रीय शासन की दुर्बलता -
विशाल साम्राज्य तब तक ही सरक्षित रहते हैं। जब तक कि उनकी केन्द्रीय सरकार सुदृढ़ रहती है। केन्द्रीय सरकार की दृढ़ता बहुत कुछ सम्राट के व्यक्तित्व पर निर्भर करती है। यदि वह शक्तिशाली व दूरदर्शी है तो वह अपनी सरकार को भली-भाँति संचालित कर सकता है। प्रान्तों में वह किसी प्रकार की अव्यवस्था उत्पन्न नहीं होने देता। परन्तु गुप्त शासकों में स्कन्दगुप्त के बाद के शासक न तो शक्तिशाली ही थे और न दूरदर्शी ही। अत: उनसे शासन व्यवस्था ठीक तरह से नहीं चल सकी । सुदूर प्रान्त केन्द्र से मुक्त होने का प्रयास करने लगे। परिणामस्वरूप अनेक महत्त्वाकाँक्षी तथा जाधी प्रान्तपति स्वतंत्र हो गये और गुप्त साम्राज्य को चुनोती देने लगे। केन्द्रीय शासन की मजोरी का लाभ उठाकर हूणों ने भी गुप्त साम्राज्य पर आक्रमण किये और उनके अनेक देशों पर अपना अधिकार कर लिया। इस प्रकार केन्द्रीय शासन की दुर्बलता से गुप्त साम्राज्य छिन्न-भिन्न होता चला गया।(3) आन्तरिक कलह या गृह युद्ध -
सिंहासन प्राप्ति के लिए राज्य परिवार के सदस्यों में युद्ध या संघर्ष होना इसके पतन का एक अन्य कारण था। इस संघर्ष का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि गुप्त वंश के उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम नहीं था और कोई भी राजकुमार अपनी शक्ति और योग्यता का प्रदर्शन कर सिंहासन प्राप्त कर सकता था। अतः यहाँ उत्तराधिकार में ज्येष्ठ पुत्राधिकार का नियम सर्वमान्य नहीं था। यह भी कहा जाता है कि एक ही समय पर विभिन्न राजधानियों से प्रतिद्वन्द्वी गुप्त शासक राज्य करते थे। समय आने पर वे विद्रोह या बदला लेने का कार्य करते थे। इस प्रकार राजकुमारों में परस्पर ईष्र्या या द्वेष का भाव उत्पन्न होना स्वाभाविक था। जब चन्द्रगुप्त प्रथम ने समुद्रगुप्त को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया तो इससे अन्य राजकुमार बड़े निराश हुए और उन्होंने समुद्रगुप्त के विरुद्ध विद्रोह कर दिया । परिणामस्वरूप उत्तराधिकार का युद्ध हुआ । समुद्रगुप्त का भाई कोच भी सिंहासन के दावेदार के रूप में उठ खड़ा हुआ । इसी तरह चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपने भाई रामगुप्त का वध करके राजगद्दी प्राप्त की। इस सन्दर्भ में स्कन्दगुप्त का उदाहरण महत्त्वपूर्ण है।स्कन्दगुप्त के शौर्य एवं पराक्रम
जूनागढ़ के लेख में लक्ष्मी के द्वारा अनेक राजकुमारों के तिरस्कार का उल्लेख मिलता है। बुद्धगुप्त की मृत्यु के बाद से गुप्त वंश में आन्तरिक झगड़ों के होने की अधिक सम्भावनाएं मिलने लगती हैं जो कि गुप्त साम्राज्य के लिए खतरनाक सिद्ध हुई। | इस सम्बंध में डॉ. उपेन्द्र ठाकुर का कथन है कि “आन्तरिक कलह तथा विदेशी आक्रमणों के फलस्वरूप गुप्त साम्राज्य अब दम तोड़ चुका था। वास्तव में चन्द्रगुप्त द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् से ही गुप्त साम्राज्य में आन्तरिक कलह का युग प्रारम्भ हो गया था। सिंहासन प्राप्ति के लिए पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता विदेशी आक्रमणों के समय भी बनी रही फलस्वरूप राजवंश तथा साम्राज्य की प्रतिष्ठा तथा शक्ति दिन प्रतिदिन कम होती गई।" ।डॉ. रतिभानुसिंह नाहर के कथनानुसार “गुप्तवंश के पतन का एक अन्य कारण गुप्त राजवंश के उत्तराधिकारियों का पारस्परिक वैमनस्य था । राजकुमारों का पारस्परिक वैमनस्य और उनकी स्वार्थपरता उत्तराधिकार के प्रश्न को प्राय: जटिल बनाती रही इस दृष्टि से समुद्रगुप्त, शहरास चन्द्रगुप्त द्वितीय के संघर्षों का उल्लेख किया जा सकता है। इन संघर्षों ने गुप्त साम्राज्य को अशक्त बनाने में अपनी भूमिका निभाई ।” इस तरह हम कह सकते है की मिहिर कुल ने समुद्रगुप्त के साथ मिलकर सम्पूर्ण हूण जाती को समूल नष्ट कर दिया
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